
जब दुनिया भर में युद्ध की आग भड़क रही है, तब अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के उस ऐतिहासिक भाषण को याद करना प्रासंगिक हो जाता है। 22 जनवरी 1917 को अमेरिकी सीनेट में दिए गए ‘पीस विदआउट विक्ट्री’ भाषण ने प्रथम विश्व युद्ध के भयानक दौर में शांति की नई संभावना दिखाई। यूरोप तब रक्तरंजित खंडहरों में डूबा था, जहां लाखों सैनिक मारे जा चुके थे।
विल्सन ने कहा कि किसी एक पक्ष की पूरी जीत से मिली शांति टिकाऊ नहीं होती। अपमानित हारने वाले पक्ष में बदले की भावना जन्म लेती है, जो नए युद्धों को न्योता देती है। उन्होंने सभी राष्ट्रों के सम्मान और सुरक्षा वाली निष्पक्ष शांति की वकालत की, जो उस समय की विजयी-पराजित वाली सोच से बिल्कुल अलग थी।
यह विचार उनके नैतिक आदर्शवाद पर टिका था। यूरोपीय देशों ने इसे अव्यावहारिक ठहराया, लेकिन विल्सन ने इसे आगे बढ़ाया। 1918 के 14 बिंदुओं में आत्मनिर्णय का अधिकार, खुली कूटनीति और राष्ट्र संघ की स्थापना जैसे सिद्धांत शामिल हुए।
यह भाषण केवल शब्द नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था को नैतिक दिशा देने का प्रयास था। Versailles की कठोर शर्तों ने विल्सन की भविष्यवाणी सही साबित की। आज भी, स्थायी शांति न्याय और सहयोग से ही संभव है।