
अमेरिकी सीनेट ने 4 मार्च को वॉर पावर्स रेजोल्यूशन के तहत ईरान के खिलाफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य कार्रवाई रोकने वाले प्रस्ताव को खारिज कर दिया। यह घटना अमेरिकी राजनीति में शक्तियों के संतुलन पर बहस को फिर से हवा दे रही है।
1973 में वियतनाम युद्ध के दौरान निक्सन काल में बने इस कानून का मकसद राष्ट्रपति को बिना कांग्रेस की मंजूरी के लंबे सैन्य अभियान चलाने से रोकना है। कानून कहता है कि सैन्य तैनाती के 48 घंटे में कांग्रेस को सूचना देनी होगी और 60 दिनों (कभी-कभी 90) में मंजूरी न मिले तो अभियान बंद करना होगा।
लेकिन इतिहास गवाह है कि राष्ट्रपति इसकी सख्ती से पालन कम ही करते। रीगन, क्लिंटन, बुश और ओबामा जैसे नेताओं ने इसे ‘सीमित कार्रवाई’ बता कर टाला। फिर भी, लेबनान (1983), सोमालिया (1993) और हाल के यमन प्रस्ताव (2019, जो ट्रंप के वीटो से विफल) जैसे मामलों में कांग्रेस का दबाव कामयाब रहा।
ईरान प्रस्ताव के असफल होने से ट्रंप की कार्रवाई पर कोई तत्काल रोक नहीं लगेगी। लेकिन सवाल बरकरार है—क्या राष्ट्रपति बिना युद्ध घोषणा के अनिश्चितकाल सैन्य बल इस्तेमाल कर सकते हैं? सुधार की मांग तेज हो रही है।
कुल मिलाकर, यह कानून राष्ट्रपति की कमांडर-इन-चीफ भूमिका और कांग्रेस के युद्ध अधिकार के बीच संतुलन का प्रतीक है। वैश्विक संकटों के दौर में इसकी प्रासंगिकता और मजबूती जरूरी है।