
वाराणसी के घाटों पर रंगभरी एकादशी का उमंग छा गया। हरिश्चंद्र घाट पर चिता की भस्म से होली खेली गई, जहां हजारों भक्त हर-हर महादेव के नारों के बीच रंग-विरंगे रूप में नजर आए। यह पर्व होली की शुरुआत का संकेत देता है, जो काशी की आध्यात्मिकता को नए आयाम दे रहा है।
मां की पालकी जुलूस के साथ घाट पर पहुंची, तो भक्तों में उत्साह की लहर दौड़ गई। चिताओं की राख को एक-दूसरे पर लगाते हुए भक्त मृत्यु के भय को भगाने का संकल्प ले रहे थे। एक भक्त ने कहा, ‘यह होली शिव तक पहुंचने का माध्यम है। मृत्यु सत्य है, लेकिन बाबा का मार्ग भी।’
दिल्ली से आए श्रद्धालु मणिकर्णिका घाट की मसान होली का इंतजार कर रहे हैं। परंपरा के अनुसार, यह लीला स्वयं महादेव ने शुरू की थी। नागा साधुओं से प्रारंभ होकर अब हर भक्त इसमें शरीक होता है।
पंचकोसी परिक्रमा के बाद मंदिरों में न्योत्री दी गई। डमरू की ध्वनि और अबीर-गुलाल के साथ भस्म का मिश्रण काशी को और सुंदर बना रहा है। यह उत्सव आस्था की गहराई को दर्शाता है, जहां जीवन और मृत्यु का संगम होता है।