वाशिंगटन यूरोपीय सहयोगियों पर अपनी सुरक्षा का अधिकांश भार खुद उठाने का दबाव बढ़ा रहा है, ताकि वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ अपनी रणनीति को मजबूत कर सके। हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी की सुनवाई में यह स्पष्ट हो गया कि नाटो अमेरिकी नीति का अभिन्न अंग बना रहेगा, लेकिन सहयोगी देशों को रक्षा व्यय में इजाफा करना होगा।

चेयरमैन माइक रोजर्स ने यूरोप से अमेरिकी सेनाओं की जल्दबाजी में वापसी का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम रूस विरोधी क्षमता को कमजोर कर सकता है, खासकर जब यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच रहा है। रोजर्स ने चेतावनी दी, “समय से पहले सेना हटाना प्रतिरोध में खाई पैदा करेगा और रूस को उकसाएगा।”
रूस की बची हुई सैन्य ताकत भारत के लिए चिंता का विषय है, जो मॉस्को और पश्चिम दोनों से संबंध बनाए रखता है। अमेरिकी यूरोपीय कमान के कमांडर जनरल क्रिस्टोफर कैवोली ने जोर दिया कि यूरोप में सेनाएं नाटो के अलावा मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों के लिए आधार प्रदान करती हैं। “यूरोप के बिना, हमारे पास वैश्विक अभियानों के लिए जरूरी ठिकाने नहीं होंगे,” उन्होंने कहा।
यूरोपीय देश रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं, लेकिन पूर्ण क्षमता 2035 तक ही आएगी। पेंटागन के डैनियल जिमरमैन ने गठबंधन के प्रति प्रतिबद्धता जताई, लेकिन यूरोप से पारंपरिक रक्षा में नेतृत्व की अपेक्षा की। यह ‘शक्ति से शांति’ की अवधारणा का हिस्सा है।
यूरोप की मजबूती से अमेरिका इंडो-पैसिफिक पर ध्यान दे सकेगा, जो भारत की सुरक्षा से जुड़ा है। सुनवाई में रूस-चीन-ईरान-उत्तर कोरिया के गठजोड़ पर चिंता व्यक्त की गई, जिसके लिए एकजुट जवाब जरूरी बताया गया। यूरोप अमेरिकी शक्ति का मंच बनेगा, जो वैश्विक अभियानों को सपोर्ट करेगा।
