
वॉशिंगटन की नई रणनीतिक योजना ने साफ कर दिया है कि 21वीं सदी का भविष्य अमेरिका द्वारा चीन के उभार का जवाब देने पर टिका है। 2026-2030 की इस योजना में भारत के साथ गहरी आर्थिक साझेदारी को हिंद-प्रशांत रणनीति का अहम हिस्सा बनाया गया है, लेकिन यह साझेदारी शर्तों पर आधारित होगी।
अमेरिका का लक्ष्य चीन से प्रत्यक्ष टकराव से बचना है, बल्कि कठोर प्रतिस्पर्धा के जरिए अपने हितों की रक्षा करना और भारत जैसे सहयोगियों के साथ संबंध मजबूत करना है। योजना में कहा गया, “चीन के उदय पर अमेरिका की प्रतिक्रिया ही इस सदी की दिशा तय करेगी।”
एशिया वैश्विक जीडीपी का करीब आधा हिस्सा पैदा करता है और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग व सप्लाई चेन यहीं केंद्रित हैं। इसलिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र अमेरिका के लिए सर्वोपरि है। चीन की तेज आर्थिक-सैन्य प्रगति ने चुनौतियां बढ़ा दी हैं।
योजना युद्ध या सत्ता परिवर्तन की इच्छा नहीं जताती, बल्कि बातचीत को प्राथमिकता देती है, साथ ही मुकाबले की तैयारी पर जोर। भारत को उभरती महाशक्ति के रूप में देखा गया है, जिसके साथ साझेदारी अमेरिकी हितों के अनुरूप होनी चाहिए।
क्षेत्र में बिना दबाव वाले आर्थिक तंत्र की वकालत की गई है। टैरिफ चोरी करने वाली कंपनियों या देशों पर नजर रखी जाएगी। चीन की सैन्य वृद्धि के जवाब में शक्ति संतुलन बनाए रखना जरूरी है ताकि व्यापार सुरक्षित रहे।
सहयोगियों के साथ आर्थिक-रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर बल, जिसमें क्वाड (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) प्रमुख है। अमेरिकी उद्योगों को अनुचित व्यापार से बचाना और तकनीकी नेतृत्व कायम रखना उद्देश्य है।
भारत पर कहा गया, “ऐसी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करेंगे जो अमेरिकी सुरक्षा व आर्थिक हित बढ़ाए और पुरानी भूलों से बचें।” यह योजना रणनीतिक संतुलन की नई शुरुआत है।