
वाशिंगटन की एक संघीय अदालत ने आव्रजन अधिकारियों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। टेक्सास की दक्षिणी जिला अदालत ने फ्रांसिस्को डी’कोस्टा नामक भारतीय नागरिक को अमेरिका वापस लाने का सख्त आदेश जारी किया, जिसे अदालत के स्पष्ट प्रतिबंध के बावजूद भारत निर्वासित कर दिया गया था। यह घटना 20 दिसंबर 2025 को घटी, जब अदालत ने सुबह 11:55 बजे स्टे ऑर्डर दिया और तीन घंटे बाद ही उसे तुर्किश एयरलाइंस की फ्लाइट में बिठा दिया गया।
अदालत के दस्तावेजों से पता चलता है कि आईसीई, यूएस अटॉर्नी कार्यालय और हिरासत केंद्र को स्टे की सूचना समय पर मिल चुकी थी। जज ने सरकार के ‘गलती से हुआ’ के दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि निर्वासन पूरी तरह अवैध था और यह न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। डी’कोस्टा 2009 से अमेरिका में रह रहे थे। अक्टूबर 2025 में उन्हें स्वैच्छिक प्रस्थान की अनुमति मिली थी, लेकिन ईसाई बनने के बाद भारत में उत्पीड़न के डर से उन्होंने मामला फिर खोलने की याचिका दायर की।
फेडरल नियमों के तहत याचिका दाखिल होते ही उनका प्रस्थान अंतिम निर्वासन आदेश में बदल गया, लेकिन इमिग्रेशन जज ने अभी फैसला नहीं सुनाया था। अदालत ने कहा कि इस तरह हटाना उनके अधिकारों का हनन है। सरकार का तर्क कि भारत से ही केस लड़ें, भी नामंजूर। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर अदालत ने वापसी को अनिवार्य बताया।
अब सरकार को डी’कोस्टा को शीघ्र वापस लाने और पांच दिनों में कदमों की रिपोर्ट देने का आदेश है। यह फैसला अमेरिकी आव्रजन व्यवस्था में न्याय की जीत का प्रतीक है, जो दिखाता है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।