
टेक्सास की एक संघीय अदालत ने अमेरिकी आव्रजन तंत्र को करारा झटका दिया है। अदालत ने फ्रांसिस्को डी’कोस्टा नामक भारतीय नागरिक को गलत तरीके से देश से निकाले जाने के बाद उसे तत्काल वापस लाने का सख्त निर्देश जारी किया। यह फैसला 9 जनवरी को आया, जिसमें जज ने निर्वासन को स्पष्ट रूप से गैरकानूनी करार दिया।
घटना 20 दिसंबर 2025 की है। अदालत ने उसी सुबह डी’कोस्टा की याचिका पर स्वयं संज्ञान लिया और सरकार को स्पष्ट आदेश दिया कि बिना अनुमति उन्हें हटाया न जाए। फिर भी, तीन घंटे बाद उन्हें ह्यूस्टन से तुर्किश एयरलाइंस की उड़ान में बिठा दिया गया। दस्तावेज बताते हैं कि आईसीई, सरकारी वकीलों और हिरासत केंद्र को स्टे ऑर्डर की सूचना पहले ही मिल चुकी थी।
अदालत ने सरकार के ‘भूल से हुआ’ के बहाने को सिरे से खारिज कर दिया। डी’कोस्टा 2009 से अमेरिका में रह रहे थे। अक्टूबर 2025 में उन्हें स्वैच्छिक प्रस्थान की इजाजत मिली, लेकिन बाद में उन्होंने मामले को फिर खोलने की अर्जी दी। उन्होंने दावा किया कि भारत में ईसाई बनने के कारण उत्पीड़न का खतरा है।
फेडरल नियमों के तहत यह अर्जी उनके प्रस्थान को अंतिम निर्वासन आदेश में बदल देती है, लेकिन आव्रजन जज ने रीओपनिंग पर फैसला नहीं दिया था। अदालत ने कहा कि जल्दबाजी में हटाना उनके अधिकारों का हनन था। सरकार का तर्क कि भारत से ही केस लड़ें, भी नामंजूर।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने वापसी को एकमात्र सही उपाय बताया। अब सरकार को डी’कोस्टा को जल्द लाने और पांच दिनों में कदमों की रिपोर्ट देने का आदेश है। यह फैसला प्रवासी समुदाय के लिए बड़ी राहत है।