तुर्की द्वारा निर्वासित पत्रकारों पर साइबर सेंसरशिप का हमला
पेरिस, 8 अप्रैल। वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने तुर्की सरकार द्वारा देश से निर्वासित पत्रकारों के खिलाफ डिजिटल सेंसरशिप के दुरुपयोग की कड़ी आलोचना की है। संगठन...


पेरिस, 8 अप्रैल। वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने तुर्की सरकार द्वारा देश से निर्वासित पत्रकारों के खिलाफ डिजिटल सेंसरशिप के दुरुपयोग की कड़ी आलोचना की है। संगठन ने अधिकारियों से इस दमनकारी रणनीति को तत्काल समाप्त करने की मांग की है।
आरएसएफ के अनुसार, यह कार्रवाई उन पत्रकारों पर नया प्रहार है जो पहले ही देश निकाले जा चुके हैं और घरेलू कानूनी लड़ाइयों से जूझ रहे हैं। साइबर सेंसरशिप को चुप कराने का हथियार बनाया जा रहा है, खासकर सोशल मीडिया अकाउंट्स को ब्लॉक करके। 2025 में करीब पांच पत्रकारों के ऑनलाइन अकाउंट्स को निशाना बनाया गया, जिनमें से चार पर दस साल पुराने मामलों में जेल की तलवार लटक रही है।
तुर्की में आरएसएफ प्रतिनिधि एरोल ओन्डेरोग्लू ने कहा, "निर्वासित पत्रकार पहले से ही तुर्की में मुकदमों से लड़ रहे हैं, ऊपर से उनके सोशल मीडिया पर सेंसरशिप कैंपेन चलाया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा का आरोप केवल बहाना है, जिससे उनकी ऑनलाइन सामग्री दबाई जा रही है।"
उन्होंने अधिकारियों से मीडिया पेशेवरों को बदनाम करने और ऑनलाइन समाचार से दूर रखने वाले अभियानों को बंद करने की अपील की। इससे तुर्की जनता को विश्वसनीय जानकारी से वंचित किया जा रहा है।
राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन की सरकार ने पत्रकारों को लंबे समय से व्यवस्थित रूप से डराया-धमकाया है, जो अब सीमाओं के परे पहुंच गया है। निशाने पर हैं ओजगुरुज संस्थापक कैन डुंडर, फ्रीलांस पत्रकार मेटिन सिहान, अल-मॉनिटर की एम्बरिन जमान, ओजगुरुज कमेंटेटर एर्क अकारर और पत्रकार हायको बगदात।
इनका कथित अपराध? पत्रकारिता करना – सीरिया में जिहादी गुटों को हथियार सप्लाई के ट्रकों की रिपोर्टिंग, गाजा संघर्ष के बीच इजरायल व्यापार और एर्दोगन की नीतियों की आलोचना। आरएसएफ का कहना है कि यह अभियान न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलता है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बीच तुर्की को अपनी नीतियां बदलनी होंगी।

