
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को साकार करते हुए 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करने का ऐलान कर दिया है। इनमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े महत्वपूर्ण मंच शामिल हैं, जो वैश्विक कल्याण के लिए बने थे। यह कदम अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने का स्पष्ट संकेत है।
व्हाइट हाउस और विदेश विभाग के मुताबिक, इनमें 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी और 35 अन्य संस्थाएं हैं। इन्हें अप्रभावी, महंगा और अमेरिकी हितों के विरुद्ध बताया गया है। विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ये संगठन अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नागरिकों की प्रगति में बाधा हैं।
रूबियो ने जोर देकर कहा, ‘राष्ट्रपति ट्रंप अपने वादों पर खरे उतर रहे हैं। हम उन नौकरशाहों को धन देना बंद कर रहे हैं जो हमारे खिलाफ काम करते हैं।’ यह फैसला अमेरिकी प्राथमिकताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।
प्रभावित संगठनों में भारत की अगुवाई वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आईएसए) भी शुमार है, जिसकी शुरुआत 2015 के पेरिस सम्मेलन में पीएम मोदी और तत्कालीन फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने की थी। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) से भी अमेरिका बाहर हो रहा है।
यह 1992 का समझौता है, जिस पर दुनिया के लगभग सभी देश सहमत हैं। ट्रंप ने जलवायु विज्ञान को बार-बार ‘धोखा’ कहा है। आईपीसीसी जैसी संस्थाओं से भी दूरी बन रही है। जनवरी 2025 में डब्ल्यूएचओ से निकलने की घोषणा पहले ही हो चुकी है, जो 2026 के बाद प्रभावी होगी।
वैश्विक मंचों पर अमेरिका की अनुपस्थिति जलवायु संकट और स्वास्थ्य चुनौतियों पर असर डालेगी। समर्थक इसे धन की बचत मानते हैं, जबकि आलोचक सहयोग की कमी को खतरा बताते हैं। ट्रंप का यह दांव अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नया रूप दे सकता है।