
बांग्लादेश में हालिया आम चुनावों ने लोकतंत्र की बहाली की नई उम्मीदें जगाई हैं। तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की शानदार जीत ने लाखों दिलों को सुकून दिया है। लेकिन उत्साह के बीच चिंताएं कम नहीं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी का 77 सीटों वाला रिकॉर्ड प्रदर्शन नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
रहमान को मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासनकाल की विरासत संभालनी है, जिसमें प्रशासनिक अव्यवस्था, आर्थिक गड़बड़ी और कट्टरवाद का बोलबाला था। पाकिस्तान के साथ ढीले रिश्तों ने आईएसआई को हथियार, आतंकी और ड्रग्स की तस्करी का रास्ता खोल दिया था। भारत तक पहुंचने वाले ये रास्ते राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने।
घरेलू मोर्चे पर भीड़तंत्र ने जन्म लिया। जमात समर्थित हिंसक झुंडों ने मीडिया, अल्पसंख्यकों और विपक्षियों पर कहर बरपाया। पुलिस निष्क्रिय रही, केस दर्ज ही नहीं हुए या जांच ठप। रहमान को विदेश नीति से ज्यादा आंतरिक सफाई पर ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जमात शांति का दिखावा कर सकती है, लेकिन बीएनपी से गठजोड़ की फिराक में है। अतीत में दोनों साथ रहे हैं। हालांकि बीएनपी का बहुमत मजबूत है, फिर भी जमात की 77 सीटें राजनीतिक वजन बढ़ाती हैं। यूनुस काल में जमात का प्रशासनिक दखल गहरा था।
अगर सत्ता से वंचित हुई तो कुंठा बढ़ेगी और सड़कें फिर अराजक होंगी। कभी 20 सीटें न लांघ सकने वाली जमात का यह उछाल विचारधारा फैलाने का हथियार बनेगा। 1971 की आजादी की लड़ाई को कलंकित करने की कोशिशें जारी रहेंगी, जिसमें जमात ने पाकिस्तान का साथ दिया था।
यूनुस ने अल्पसंख्यक अत्याचार, उगाही और हिंसा को बढ़ावा दिया। लेकिन जनता ने साफ इंकार किया है। रहमान सामान्यcy चाहते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल सीमा पर जमात की जीत से कट्टरवाद फैलने का खतरा बढ़ा है। भारत की सुरक्षा चिंतित। रहमान को सतर्क रहना होगा।