
ढाका की सियासी गलियों में तनाव बढ़ता जा रहा है। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर कट्टरपंथी गुटों को खुली छूट देने का गंभीर आरोप लगाया है। विशेष इंटरव्यू में हसीना ने कहा कि यह सरकार गैर-मुस्लिमों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को रोकने में पूरी तरह विफल रही है।
अवामी लीग की प्रमुख हसीना ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘सत्ता में बैठे लोग अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी निभाने में नाकाम साबित हुए हैं – सभी नागरिकों की समान सुरक्षा।’ अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि बिना जनादेश वाली सरकार की उदासीनता का परिणाम हैं, जिसने सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दिया।
बांग्लादेश धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ था, जहां सभी धर्मों के लोग निडर रह सकें। आज हिंदू, बौद्ध, ईसाई और अहमदी समुदाय निशाने पर हैं। यह सरकारी नाकामी और कट्टरवादियों के तुष्टिकरण का नतीजा है।
हाल की घटनाएं रोंगटे खड़े कर देती हैं। नौगांव के मोहदेवपुर में लूट के आरोप में 25 वर्षीय मिथुन सरकार नहर में कूदे और डूब गए। सोमवार को नरसिंगडी में 40 वर्षीय सरत चक्रवर्ती माणिक पर धारदार हथियारों से हमला। जशोर में 38 वर्षीय राणा प्रताप बैरागी की गोली मारकर हत्या। शरियतपुर में खोकन चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या। मैमनसिंह में बजेंद्र बिस्वास की गोलीबारी से मौत। 24 दिसंबर को अमृत मंडल की लिंचिंग और 18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास को फांसी देकर जिंदा जलाया गया।
19 दिनों में सातवीं ऐसी घटना। बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई यूनिटी काउंसिल के अनुसार अगस्त 2024 से 2442 हमले और 150 से अधिक मंदिरों पर तोड़फोड़। हसीना की चेतावनी के साथ सवाल उठता है – क्या यूनुस सरकार अल्पसंख्यकों की रक्षा कर पाएगी?