
27 फरवरी 1933 की ठंडी रात बर्लिन के लिए एक काला अध्याय साबित हुई। जर्मनी की संसद राइखस्टाग भवन में अचानक भयानक आग लग गई। लपटें इतनी तेज थीं कि पूरा भवन जलकर राख हो गया। यह घटना न केवल एक इमारत को नष्ट करने वाली आग थी, बल्कि लोकतंत्र को समाप्त करने वाली चिंगारी भी बनी।
हिटलर को चांसलर बने अभी चार हफ्ते ही बीते थे। आग लगते ही डच नागरिक मारिनस वान डेर लुब्बे को मौके पर गिरफ्तार किया गया। नाजियों ने इसे कम्युनिस्टों की साजिश करार दे दिया। हिटलर ने इसे राष्ट्र-विरोधी षड्यंत्र बताते हुए आपातकाल की मांग की।
अगले ही दिन 28 फरवरी को राइखस्टाग फायर डिक्री जारी हो गई। इसने बोलने की आजादी, प्रेस स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को तत्काल निलंबित कर दिया। पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तारी का अधिकार मिला। हजारों वामपंथी कार्यकर्ता और विरोधी नेता जेलों में ठूंस दिए गए।
मार्च में इनेबलिंग एक्ट पारित होते ही हिटलर को संसदीय मंजूरी के बिना कानून बनाने की ताकत मिल गई। वीमर गणराज्य का अंत हो गया और नाजी तानाशाही का युग शुरू। इतिहासकार आज भी बहस करते हैं कि आग किसने लगाई, लेकिन नाजियों ने इसे सत्ता हथियाने के लिए सोने में सुहागा बना लिया।
भय का माहौल बनाकर जनता को सख्ती का समर्थन करने को मजबूर किया। यही नीति जर्मनी को द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही की ओर ले गई। राइखस्टाग अग्निकांड लोकतंत्र के लिए एक सबक है कि संकट कैसे तानाशाही को जन्म दे सकते हैं।