पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और गिलगित-बाल्टिस्तान में आवश्यक सेवाओं की भारी किल्लत से मानवीय संकट गहराता जा रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, खाद्य संकट और बिजली की कटौती जैसी समस्याएं राजनीतिक उपेक्षा व दमनकारी शासन से और विकराल हो गई हैं।

हालिया विश्लेषण के मुताबिक, महिलाओं व छात्रों के नेतृत्व में हो रहे आंदोलन समाज में व्याप्त असंतोष को उजागर कर रहे हैं, जो दशकों पुरानी संरचनात्मक लापरवाही का परिणाम है।
बिजली संकट साल भर का साथी बन गया है। विशाल जलविद्युत परियोजनाओं के बावजूद लंबी बिजली कटौतियां और ऊंचे बिल आम जन को परेशान कर रहे हैं। पीओके में हालात बेकाबू हो गए जब बिल न भरने व वेतन भुगतान की मांग पर पूरे इलाके में हड़ताल हो गई।
प्रशासन ने गिरफ्तारियां, इंटरनेट बंदी व बल प्रयोग से जवाब दिया, लेकिन आक्रोश शांत नहीं हुआ। गिलगित-बाल्टिस्तान में जमीन के मालिकाना हक पर विवाद भड़क उठा है। पुश्तैनी संपत्ति को सरकारी बताकर बिना मुआवजे कब्जा करने से लोग सड़कों पर उतर आए।
स्थानीय बिजली पाकिस्तान के ग्रिड में चली जाती है, जबकि निवासी संकट झेलते हैं। सुरक्षा एजेंसियों पर दमन, निगरानी व गायब करने के आरोप लगे हैं। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मंच पर भी इन मुद्दों ने सुर्खियां बटोरीं।
पाकिस्तान सरकार बाहरी साजिश का रोना रोती है, पर स्थानीय आर्थिक पीड़ा को नजरअंदाज कर रही है। सुधारों के बिना हालात बिगड़ते जाएंगे।
