
पनामा नहर महज एक जलमार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के खेल का केंद्र रही है। 10 जनवरी 1962 को पनामा सिटी में भड़के दंगों ने अमेरिकी वर्चस्व की पोल खोल दी। स्थानीय जनता, विशेषकर नौजवानों का आक्रोश था कि उनकी धरती पर बने इस महत्वपूर्ण रास्ते पर उनका हक इतना सीमित क्यों?
शीत युद्ध के दौर में अमेरिका के लिए नहर रणनीतिक जीवन रेखा थी। लेकिन पनामा का उभारता राष्ट्रवाद बता गया कि विदेशी कब्जा अब टिक नहीं सकता। इन दंगों ने दुनिया को संदेश दिया कि मामला केवल प्रबंधन का नहीं, बल्कि स्वाभिमान का है।
1977 की टोरीहोस-कार्टर संधि ने नहर हस्तांतरण का मार्ग प्रशस्त किया। 31 दिसंबर 1999 को पनामा ने पूरा नियंत्रण ले लिया, अमेरिकी प्रत्यक्ष राज का अंत हो गया। हालांकि, प्रभाव बरकरार रहा।
2026 में नहर फिर सुर्खियों में है। अमेरिका अब साझेदारी से प्रभाव जमाता है, जबकि चीन के व्यापारिक विस्तार ने इसे महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक बना दिया। जलवायु परिवर्तन से पानी की किल्लत ने वैश्विक व्यापार को हिला दिया है।
1962 की चिंगारी आज भी जल रही है। यह साबित करती है कि जनाक्रोश अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदल सकता है और उसका असर दशकों तक रहता है।