
इस्लामाबाद की आंतरिक स्थिरता की चमकदार तस्वीर अब धुंधली पड़ रही है। एक विश्लेषण के अनुसार, असहमति दमन और वैश्विक शक्तियों की क्षणिक सहानुभूति से बनी यह व्यवस्था बेहद नाजुक है। हाइब्रिड शासन अब जनता के भरोसे को जीतने में नाकाम रहा है और इसकी खुद की भ्रांतियां पतन के बीज बो रही हैं।
ईस्ट एशिया फोरम में इस्लामाबाद के सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के प्रमुख इम्तियाज गुल ने 2025 को पाकिस्तान में सैन्य शक्ति के पूर्ण सुदृढ़ीकरण का वर्ष बताया। पहले जहां नागरिक चेहरा दिखता था और सत्ता सेना के हाथ में, अब खुली सैन्य सत्ता का राज है।
लोकतंत्र के मोर्चे पर झटके लगे। न्यायपालिका कमजोर पड़ी, संसद का कद घटा और चुने हुए प्रतिनिधि महज आज्ञाकारी। फरवरी 2024 के विवादित चुनावों के बाद बनी नेशनल असेंबली के अधिकांश सदस्य सैन्य छत्रछाया में नजर आए। कानूनों के जरिए नागरिक संस्थाओं के अधिकार सशस्त्र बलों को सौंपे गए, जहां लोकतांत्रिक होड़ की जगह स्थिरता को तरजीह मिली।
पूर्व पीएम इमरान खान का हाशियाकरण गहराया। अगस्त 2023 से कथित राजनीतिक मामलों में जेल में, उनकी गिरफ्तारी ने अशांति भड़काई। समर्थकों ने ट्रंप से जुड़े अमेरिकी सांसदों से रिहाई की गुहार लगाई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय घटनाएं विफल रहीं। दिसंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र की यातना विशेषज्ञ ने अदियाला जेल के अमानवीय हालात पर कार्रवाई मांगी।
ट्रंप का पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर को ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहना खान समर्थकों की उम्मीदें चूर कर गया। 2022 के अविश्वास के बाद 180 से ज्यादा मुकदमे। भू-राजनीति ने लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर नजर कमजोर कर दी।
रिपोर्ट चेताती है कि असंतोष से भरे पाकिस्तान में यह अल्पकालिक व्यवस्था गहरी अराजकता को जन्म दे सकती है। सैन्य वर्चस्व जन-विश्वास खो चुका है।