
अमेरिका के साथ प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा होने के बावजूद पाकिस्तान बार-बार अविश्वसनीय साबित हो रहा है। न्यूयॉर्क के थिंक टैंक गेटस्टोन इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पाकिस्तान को विश्वसनीय साझेदार के बजाय बेहद जटिल भागीदार माना जाए। उसके एमएनएनए विशेषाधिकारों की कड़ी समीक्षा आवश्यक है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी नेतृत्व ईरान को अमेरिका और इजरायल से ज्यादा महत्व देता है, खासकर गाजा जैसे मुद्दों पर। यही कारण है कि वाशिंगटन इस्लामाबाद पर भरोसा नहीं कर पाता।
पाकिस्तान ने कभी इजरायल को मान्यता नहीं दी। 1979 में ईरान के इस्लामी गणराज्य की स्थापना के बाद वह पहला देश था जिसने उसे स्वीकार किया। 1947 में पाकिस्तान के निर्माण पर ईरान ने सबसे पहले मान्यता दी थी। दोनों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2.8 अरब डॉलर के करीब है।
इस्लामाबाद अपने ईरानी संबंधों को भाईचारे और साझा हितों पर आधारित बताता है। बलूचिस्तान पर दोनों का एक जैसा रुख है—बलूच गतिविधियों को वे अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मानते हैं। नवंबर 2024 में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर हुसैन सलामी ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर से भेंट की। दोनों ने बलूच आंदोलनों के विरुद्ध सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
यह गठबंधन चीन के साथ साझा आर्थिक योजनाओं से मजबूत होता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बेल्ट एंड रोड का अहम हिस्सा है, और ईरान भी इसमें जुड़ना चाहता है। अमेरिका को अब पाकिस्तान की दोहरी नीतियों से सावधान होकर ठोस कदम उठाने चाहिए।