
पाकिस्तान में बार-बार हो रही सुरक्षा खामियों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के तहत चीनी निवेशों को गंभीर खतरे में डाल दिया है। एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जिहादी और अलगाववादी गुटों का गढ़ बने रहने तक इस्लामाबाद की ‘भाईचारे’ की बातें व्यर्थ साबित होंगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, यदि बीजिंग ने इतिहास से सबक नहीं लिया, तो उसे न केवल सैनिकों की बल्कि नागरिकों की जानें गंवानी पड़ सकती हैं, परियोजनाएं ठप हो सकती हैं और वैश्विक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है।
यूरोप वायर में प्रकाशित विश्लेषण में ग्रीक पत्रकार दिमित्रा स्टाइको ने बताया कि चीन अब सामान्य आश्वासनों से संतुष्ट नहीं है। वह जमीन पर मजबूत सुरक्षा तंत्र की मांग कर रहा है, जिसमें विशेष इकाइयों का गठन और संयुक्त प्रशिक्षण शामिल हैं।
यह बदलाव सहयोग में शक्ति संतुलन का संकेत देता है। पाकिस्तान महत्वपूर्ण साझेदार तो है, लेकिन अब प्रदर्शन पर सख्त शर्तें लग रही हैं। रणनीतिक रिश्ते धैर्य की कसौटी बन चुके हैं।
2024-25 में श्रृंखलाबद्ध हमलों ने कमजोरियां उजागर कीं। मार्च 2024 में शांगला में डासू जलविद्युत परियोजना के लिए जा रहे पांच चीनी इंजीनियरों और ड्राइवर की आत्मघाती हमले में मौत हो गई। अक्टूबर में कराची एयरपोर्ट के पास दो चीनी मारे गए। बलूचिस्तान में बीएलए ने चीनी हितों पर बार-बार निशाना साधा।
ये घटनाएं दोनों देशों में तनाव बढ़ा रही हैं। चीन ने कड़े सुरक्षा उपायों की मांग की है। आधिकारिक बयानों में सहयोग मजबूत दिखाया जा रहा है, लेकिन हकीकत पाकिस्तान की गारंटी क्षमता पर सवाल उठाती है।
2025 में आईएसआईएस-के की सक्रियता ने खतरे को शहरों और महत्वपूर्ण ढांचे तक फैला दिया। दक्षिण एशिया में चीनी नागरिकों पर हमले अब एक व्यापक आतंकी रणनीति का हिस्सा हैं, जिसका केंद्र पाकिस्तान है। सीपीईसी को बचाने के लिए इस्लामाबाद को सुरक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाने होंगे।