
इस्लामाबाद में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की इंटीरियर स्टैंडिंग कमेटी ने दहेज प्रतिबंधक विधेयक को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया। यह फैसला तब आया जब देश में प्रतिवर्ष दहेज विवादों से करीब दो हजार दुल्हनों की जान जाती है। यह कदम न केवल विधायी विफलता दर्शाता है, बल्कि परंपराओं के नाम पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा को चुनौती न देने की राज्य की दुविधा भी उजागर करता है।
पीपीपी नेता शर्मिला फारूकी द्वारा पेश बिल में दहेज देने, लेने या प्रचार करने पर पांच वर्ष की कैद और 2.5 लाख रुपये या दहेज मूल्य के बराबर जुर्माना प्रस्तावित था। दहेज मांगने वालों को दो वर्ष जेल की सजा। शादी के सारे उपहार दुल्हन की निजी संपत्ति घोषित कर तीन माह में सौंपने का प्रावधान था।
कमेटी अध्यक्ष राजा खुर्रम नवाज ने कहा कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं, इन्हें सख्ती से लागू करें। सदस्य ख्वाजा इजरुल हसन ने शिकायत की जिम्मेदारी दुल्हन पक्ष पर डालने पर आपत्ति जताई, जो पारिवारिक संबंध बिगाड़ सकती है।
पाकिस्तान में दहेज को सांस्कृतिक उपहार माना जाता है—नकद, गहने, सामान—जो दबाव, अपमान और हत्याओं का कारण बनता है। अपर्याप्त दहेज पर बहिष्कार, बेटियां बोझ। पंजाब स्पीकर के अनुसार 1.35 करोड़ अविवाहित महिलाएं दहेज के अभाव में। गरीब परिवार कर्ज में डूबते हैं।
डॉ. रखशिंदा परवीन इसे लैंगिक दबावों से बचने की प्रवृत्ति बताती हैं। यह अस्वीकृति कानून निर्माण की कमजोरी दिखाती है, जहां सुधारवादी बिल कठघरे में, जबकि यथास्थिति वाले आसानी से पार पा जाते हैं। राज्य नियंत्रण चाहता है, उन्मूलन नहीं।