
नई दिल्ली। पाकिस्तान की डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभालने का रास्ता राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने से होकर गुजरता है। प्रमुख अखबार डॉन में छपे एक विश्लेषण के मुताबिक, भ्रष्टाचार और खराब प्रशासन आर्थिक प्रगति की राह में सबसे बड़ी रुकावट हैं।
अर्थशास्त्री साकिब शेरानी का लेख साफ कहता है कि आर्थिक तंत्र राजनीतिक ढांचे की ही उपज है। जब राजनीति भ्रष्ट हो, तो पूरा सिस्टम प्रभावित होता है। आर्थिक समस्याओं को राजनीति से अलग करके हल करना नामुमकिन है।
लेख में चेतावनी दी गई है कि बिना राजनीतिक सुधार के गहरे आर्थिक बदलाव की बातें धोखा ही हैं। संसाधनों का गलत इस्तेमाल और रिश्वतखोरी पर टिका मौजूदा ढांचा टिकाऊ निवेश को रोकेगा।
शेरानी ने एलीट समूह के ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ सिद्धांत को खारिज किया। पाकिस्तानी कंपनियां महंगी बिजली, 50% से ज्यादा टैक्स, महंगी मुद्रा, तस्करी और 68 अरब डॉलर की काली अर्थव्यवस्था से जूझ रही हैं।
इसके अलावे सरकारी हस्तक्षेप, नियमों का बोझ, रिश्वत, कुशल मजदूरों की कमी, निजी सुरक्षा-पानी पर खर्च, गैंगों की वसूली, राजनीतिक दबाव और नीतिगत उलटफेर चुनौतियां हैं। बिना राजनीतिक सुधार के कंपनियों से प्रतिस्पर्धा की उम्मीद बेकार है।
पाकिस्तान को ईमानदार राजनीतिक बदलाव से अर्थव्यवस्था को नई जान फूंकनी होगी।