
पाकिस्तान में पत्रकारिता अब जानलेवा हो चुकी है। हालिया रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पीईसीए) के तहत ऑनलाइन खबरों पर सख्ती, प्रभावशाली लोगों द्वारा मानहानि के केस और सुरक्षा एजेंसियों का दबाव ने मीडिया की आजादी को बुरी तरह चोट पहुंचाई है।
विरोध मार्च, राजनीतिक हलचलों और संवेदनशील इलाकों की कवरेज करने वाले रिपोर्टर उत्पीड़न से हिंसा तक झेल रहे हैं। प्रेस क्लबों ने दर्जनों हमलों और हिरासत की घटनाओं का उल्लेख किया, लेकिन जांचें पारदर्शी नहीं होतीं, जिससे अपराधी बेखौफ हैं।
महिला पत्रकारों को साइबर हमलों का ज्यादा सामना—ट्रोलिंग, धमकियां और बदनामी की साजिशें, खासकर राजनीति-मानवाधिकार पर रिपोर्टिंग में। राजनीतिक ध्रुवीकरण इसे भड़काता है।
कानूनी-आर्थिक बंधनों के बीच संविधान की गारंटी व्यावहारिक नहीं। मानहानि, आतंकीरोधी, ईशनिंदा और साइबर कानून पत्रकारों के हथियार बन गए।
न्यूज रूम में स्व-संयम हावी—संपादक जोखिम तौलकर खबरें नरमाते या दबाते हैं। इससे जनचर्चा प्रभावित, लोग फर्जी खबरों पर भरोसा करने लगे।
बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में खतरा ज्यादा—कम सहायता, सुरक्षा अभियान जिम्मेदार। रिपोर्ट सुधार की मांग करती है।