
इस्लामाबाद। पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप अब डिजिटल जाल से बुने जा रहे हैं, जहां अपुष्ट स्क्रीनशॉट और छेड़छाड़ वाले मैसेज लोगों की जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे ‘ईशनिंदा का धंधा’ बता रहे हैं, जिसमें फर्जी गवाहियां और ऑनलाइन सबूतों का दुरुपयोग आम हो गया है।
पिछले दिसंबर में लाहौर हाईकोर्ट की रावलपिंडी बेंच ने एक ऐसे मामले में छह लोगों को बरी कर दिया, जिन्हें पहले मौत या उम्रकैद की सजा हो चुकी थी। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी और कथित डिजिटल सामग्री के बीच कोई पुख्ता कड़ी नहीं जोड़ सका। इस फैसले ने ऐसे बढ़ते कारोबार पर चिंता जताई, जहां मौत की सजा वाले कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है।
ज्यादातर मामले गरीबों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर केंद्रित हैं। बिचौलिये पैसे निचोड़कर केस वापस करवा देते हैं। पाकिस्तानी दंड संहिता की धारा 295-सी पैगंबर मुहम्मद के अपमान पर फांसी अनिवार्य करती है, जो महज आरोप पर गिरफ्तारी, भीड़ हिंसा या हत्या को जन्म देती है। 1994 से 2024 तक 104 लोगों की न्यायेतर हत्या हुई।
कट्टर संगठनों जैसे तहरीक-ए-लब्बैक और कभी-कभी एफआईए अधिकारियों की संलिप्तता सामने आई है। बिना फॉरेंसिक जांच के शिकायतें दर्ज हो जाती हैं। ईसाई महिला शगुफ्ता किरण का केस इसका उदाहरण है—2021 में व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर गिरफ्तार, 2024 में मौत की सजा। वह डेथ रो पर अपील का इंतजार कर रही हैं।
ये मामले पाकिस्तान की संस्थाओं की कमजोरियों को उजागर करते हैं, जहां ईशनिंदा आरोप डराने-धमकाने और उगाही का जरिया बन गए हैं। ईसाई, अहमदिया, हिंदू, सिख और शिया सबसे असुरक्षित हैं। कानूनी सुधार जरूरी हैं।