
पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान (पीओजीबी) में संसाधनों के सैन्यीकरण ने स्थानीय जनता में गहरी निराशा पैदा कर दी है। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर 6 ट्रिलियन डॉलर के खनिज भंडारों से आर्थिक उन्नति का वादा कर रहे हैं, लेकिन यह बयानबाजी क्षेत्रीय शोषण और उपेक्षा की काली सच्चाई को छिपाने का प्रयास मात्र है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद पीओजीबी को विकास का केंद्र बनाने के बजाय रणनीतिक बफर जोन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) के बड़े-बड़े वादे हवा हो गए, जिससे लोगों का भरोसा टूटा। मुनीर का खनिज दोहन प्लान पीओजीबी और खैबर पख्तूनख्वा के दुर्लभ संसाधनों पर केंद्रित है, लेकिन यह सेना के बढ़ते हस्तक्षेप को मजबूत करने का हथियार बन गया।
स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (एसआईएफसी) इसकी मिसाल है, जो सैन्य प्रभाव वाला निकाय विदेशी निवेश के नाम पर खनन और ऊर्जा क्षेत्रों पर नियंत्रण कस रहा है। 25 अप्रैल 2025 को एसआईएफसी ने माइनिंग एंड मिनरल संशोधन अधिनियम लागू किया, जिससे खनन अधिकार केंद्र सरकार के पास चले गए। 15 अगस्त 2024 के पीओजीबी माइनिंग नियम संशोधन ने स्थानीय स्वायत्तता को और कुचल दिया।
इसका परिणाम शिगर घाटी में अप्रैल 2025 के विशाल विरोध प्रदर्शन के रूप में सामने आया। के-2 एक्शन कमेटी के नेतृत्व में हजारों ने ‘कब्जे पर कब्जा नामंजूर’ के नारे लगाए। यह आंदोलन केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं, बल्कि दशकों के शोषण के खिलाफ विद्रोह है।
पीओजीबी की जनता अब सच्चे विकास और अधिकारों की मांग कर रही है, वरना असंतोष और भड़केगा।