
काठमांडू के हालिया चुनाव परिणाम नेपाल और भारत के बीच ठंडे पड़े रिश्तों को गर्म करने का सुनहरा मौका ला रहे हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की मजबूत सरकार बनने की संभावना से दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ सकता है।
हिमालयी देश में राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन इस बार स्पष्ट जनादेश मिलने की उम्मीद है। आरएसपी नेता बालेंद्र शाह का ‘नेपाल फर्स्ट’ नारा मतदाताओं को भाया। चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच यह बदलाव भारत के लिए राहत वाला है।
भारत-नेपाल संबंध 1950 की शांति संधि पर टिके हैं, जो खुली सीमा और सांस्कृतिक जुड़ाव को बढ़ावा देते हैं। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझा है, जहां से 63 फीसदी आयात होता है। लोगों के बीच घनिष्ठ संपर्क दोनों देशों को करीब रखता है।
हालांकि सीमा विवाद, अविश्वास और सुरक्षा मुद्दों ने रिश्तों को जटिल बनाया। पूर्वी झापा का दमक इंडस्ट्रियल पार्क, जो बीआरआई का हिस्सा है, भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास होने से चिंता का विषय रहा। आरएसपी के घोषणापत्र में इसका जिक्र न होने से नीति परिवर्तन के संकेत मिले।
मुद्रा विनिमय दर की समीक्षा का वचन भी महत्वपूर्ण है। 1993 से 100 भारतीय रुपये के बदले 160 नेपाली रुपये तय हैं। पार्टी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से इसकी जांच कराएगी।
विदेश मंत्रालय ने चुनावों का स्वागत किया और नई सरकार के साथ सहयोग की इच्छा जताई। पूर्व राजदूत जयंत प्रसाद ने सुशासन की कामना की। शाह का राष्ट्रवादी रुख दोनों पड़ोसियों से संतुलन बनाए रखेगा।
2015 के संविधान के बाद पहली बार एकछत्र सरकार बन सकती है। रोजगार और अर्थव्यवस्था पर फोकस से भारत के साथ संबंध मजबूत होंगे। यह बदलाव दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।