
लंदन। म्यांमार में सैन्य शासन के तहत चल रहे चुनावों पर गंभीर सवाल उठे हैं। पश्चिमी राजनयिकों और जानकारों ने इन्हें महज एक नाटकीय प्रदर्शन करार दिया है, जिसका मकसद वैश्विक स्वीकृति हासिल करना है। 28 दिसंबर से 25 जनवरी तक तीन चरणों में हो रहे ये मतदान देश में कोई सच्चा लोकतांत्रिक परिवर्तन नहीं ला रहे।
प्रतिष्ठित ब्रिटिश अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग भी मानता है कि पड़ोसी देश का अस्थिर होना स्वीकार्य नहीं, लेकिन ये चुनाव निष्पक्ष नहीं हैं। मतदान स्थलों पर सशस्त्र पुलिस तैनात है, प्रचार वीडियो बज रहे हैं, किंतु यांगून जैसे शहरों में उत्साह नगण्य है।
2021 के बाद पहला चुनाव होने के बावजूद, मतदान की दर बेहद कम है। उस समय आंग सान सू ची की पार्टी को भारी समर्थन मिला था, जिसके बाद तख्तापलट हुआ। पांच साल बाद देश हिंसा, आर्थिक पतन और सामाजिक विघटन से जूझ रहा है।
यांगून की एक 32 वर्षीय महिला ने गुमनाम रहते कहा, ‘वोट न दूं तो डर, दूं तो अपने मूल्यों से विश्वासघात। हर कदम जोखिम भरा।’ विशेषज्ञों का मानना है कि जुंटा मतदाताओं को जबरन बुला रहा है, समस्याओं का हल नहीं।
संयुक्त राष्ट्र की पूर्व दूत यांगही ली ने इन्हें सैन्य के झूठे चुनावों का सबसे बुरा रूप बताया। ‘न स्वतंत्र, न निष्पक्ष – नतीजे तय हैं।’ ये चुनाव सत्ता कायम रखने का हथकंडा हैं, लोकतंत्र की राह नहीं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसे नकारना होगा।