
मध्य पूर्व में तेज हो रहे संघर्ष ने एशिया महाद्वीप में चीन के लिए सुनहरे अवसर खोल दिए हैं। अमेरिका के संसाधन और ध्यान दूसरे मोर्चे पर बंटने से बीजिंग को फायदा मिल रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि ये युद्ध क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन को हिला रहे हैं। अमेरिकी व्यस्तता से एशिया में कमजोरियां उभर आती हैं, जिनका चीन चतुराई से लाभ उठाता है।
चीन को खुद संकट रचने की जरूरत नहीं। जब अमेरिका कहीं उलझता है, तब बीजिंग अपनी चालें चलता है। इराक युद्ध के दौरान दक्षिण चीन सागर में उसकी मौजूदगी बढ़ी, बिना ज्यादा विरोध के।
2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी विदाई के समय ताइवान के आसपास चीनी हवाई अतिक्रमण 900 से अधिक बार दर्ज हुए। यह बिना युद्ध के दबाव बनाने की रणनीति है।
अमेरिकी विमानवाहक पूरब भूमध्यसागरीय या लाल सागर में तैनात हों, तो पश्चिमी प्रशांत कमजोर पड़ जाता है। चीन छोटे-छोटे कदमों से—सैन्य अभ्यास, आधार निर्माण—अपनी पोजीशन मजबूत करता है।
भारत की उत्तरी सीमा पर गलवान संघर्ष के बाद चीनी निर्माण इसी का हिस्सा हैं। बीजिंग का लक्ष्य सीधा टकराव नहीं, बल्कि धीरे-धीरे स्थिति अपने हक में मोड़ना है। ये अवसर चीन के पक्ष में बदलाव ला सकते हैं।

