
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित करते हुए भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने मानवाधिकारों के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने का जोरदार आह्वान किया। उन्होंने विकास, क्षमता निर्माण और सबसे कमजोर वर्गों के जीवन में वास्तविक बदलाव पर जोर दिया, जबकि राजनीतिकरण, चुनिंदागीरी या दोहरे मापदंडों को सिरे से खारिज कर दिया।
डॉ. जयशंकर ने कहा कि संघर्षपूर्ण दुनिया में भारत संवाद, सहमति और मानवीय प्रगति को बढ़ावा देना चाहता है। उन्होंने आतंकवाद को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन बताते हुए इसके खिलाफ जीरो टॉलरेंस की मांग की। ‘आतंकवाद का कोई औचित्य नहीं, खासकर जब यह बेगुनाहों की जान लेता है।’
भारत को परिषद में सातवीं बार 177 वोटों से चुना जाना वैश्विक दक्षिण के भरोसे को दर्शाता है। जयशंकर ने प्रतिबद्धता जताई कि संवाद और साझेदारी से ही अधिकारों की रक्षा होगी।
भारत के लोकतांत्रिक अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने क्षेत्रीय असुरक्षा के वैश्विक प्रभाव पर चिंता जताई। कुछ पश्चिमी संस्थाओं की आलोचना करते हुए कहा कि किसी का भी अलगाव सबके अधिकार कमजोर करता है।
तकनीक को मानवाधिकारों का बल गुणक बताते हुए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) का उदाहरण दिया, जो करोड़ों को पारदर्शी सेवाएं दे रहा है। महामारी, जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने असमानताएं बढ़ाई हैं, इसलिए समावेशी रास्ता जरूरी।
जयशंकर का संदेश मानवाधिकारों को विकास से जोड़ने वाला है, जो आतंकवाद के खिलाफ मजबूत रुख अपनाते हुए वैश्विक एकता की मिसाल है।