
13 जनवरी 1898 का दिन फ्रांस के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। प्रसिद्ध लेखक एमील जोला ने पेरिस के अखबार एल’ अरोर में ‘जे एक्यूज…!’ शीर्षक से अपना खुला पत्र प्रकाशित किया। यह मात्र एक लेख नहीं, बल्कि सत्ता, सेना और न्याय व्यवस्था के खिलाफ सीधा हमला था, जो ड्रेफस कांड की पोल खोलने वाला साबित हुआ।
1894 में फ्रांसीसी सेना के यहूदी अधिकारी अल्फ्रेड ड्रेफस पर जर्मनी के लिए जासूसी का आरोप लगा। सबूत कमजोर थे, लेकिन सैन्य अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया। सार्वजनिक अपमान के बाद उन्हें डेविल्स आइलैंड की अमानवीय कैद में डाल दिया गया। बाद में पता चला कि असली गद्दार फर्डिनेंड एस्टर्हाजी था और सबूतों से छेड़छाड़ हुई थी। फिर भी सेना ने गलती मानने से इनकार कर दिया। इस मामले ने फ्रांस में छिपे यहूदी-विरोध को उजागर किया।
जोला ने पत्र में नाम लेकर सेना प्रमुखों, मंत्रियों और जजों पर झूठ, साजिश और अन्याय के आरोप लगाए। उन्होंने लिखा कि कैसे निर्दोष को बलि चढ़ाया गया। उस समय सेना की आलोचना देशद्रोह मानी जाती थी, इसलिए यह साहसिक कदम था।
लेख छपते ही फ्रांस दो गुटों में बंट गया। राष्ट्रवादियों ने जोला को गद्दार कहा, तो बुद्धिजीवियों ने न्याय का झंडा उठाया। जोला पर मानहानि का केस चला, उन्हें सजा मिली और इंग्लैंड भागना पड़ा। लेकिन उनका संदेश दब न सका।
जन दबाव से 1899 में ड्रेफस का पुनः मुकदमा चला। 1906 में उन्हें पूरी तरह निर्दोष साबित कर सेना में बहाल किया गया। ‘जे एक्यूज…!’ ने सिद्ध किया कि लेखनी सत्ता को ललकार सकती है। आज यह अभिव्यक्ति स्वतंत्रता और मानवाधिकार का प्रतीक है।