
देश की खुफिया एजेंसियां एक गंभीर खतरे की आहट सुन रही हैं। इस्लामिक स्टेट से जुड़े भारतीय मूल के आतंकी अब अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण लड़ाकू भूमिकाएं निभा रहे हैं। आईएसकेपी उन्हें न सिर्फ जंग के मैदान में उतार रहा है, बल्कि प्रचार सामग्री में शहीदों की तरह पेश भी कर रहा है।
2019 में लगभग 200 भारतीय आईएस से जुड़े थे, लेकिन सीरिया-इराक में भेदभाव के कारण कई लौट आए। अब हालात उलटे हैं। आईएस भारतीय युवाओं को कट्टर बनाकर अफगानिस्तान भेज रहा है, जहां सांस्कृतिक समानता उन्हें सहज महसूस कराती है।
खाड़ी देशों के रास्ते चोरी-छिपे यात्रा करते हुए ये युवा आत्मघाती हमलों तक पहुंच रहे हैं। केरल के अबू खालिद अल-हिंदी, अबू राजह और नजीब अल-हिंदी जैसे नाम आईएसकेपी की पत्रिका ‘वॉयस ऑफ खुरासान’ में नायक बने हैं। इनकी कहानियां युवाओं को बहकाने का हथियार हैं।
आईएसकेपी को भारी नुकसान झेलना पड़ा है, इसलिए नए लड़ाकों की तलाश तेज है। ऑनलाइन गतिविधियां बढ़ी हैं और लंबे समय तक भारत से हजारों की भर्ती का लक्ष्य है। सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर हैं।