
नई दिल्ली में भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर चर्चाओं का दौर जोरों पर है। इसे ‘सभी सौदों की मां’ करार दिया जा रहा है, जिसका असर पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों तक महसूस हो रहा है।
बड़ी शक्तियां टैरिफ को हथियार बनाकर सप्लाई चेन पर एकाधिकार कायम करने में जुटी हैं। ऐसे में यह समझौता एक-दूसरे पर निर्भरता के दौर में खुली बातचीत की मिसाल पेश करता है। ट्रंप जैसे नेताओं के टैरिफ खेल ने वैश्विक परिदृश्य को तेजी से बदल दिया है।
यह डील टैरिफ से कहीं आगे जाती है। यह दर्शाता है कि ताकतवर देश बिना अपने मूल्यों को त्यागे एकजुट होकर मजबूत बन सकते हैं। भारत के लिए यह एक मजबूत संदेश है कि वह अपनी वैचारिक पहचान बनाए रखते हुए शीर्ष विनिर्माण और सेवा शक्ति बनने को प्रतिबद्ध है।
यूरोप को चाहिए कि यह समझौता केवल सुर्खियों तक सीमित न रहे। बाजार पहुंच, ऊर्जा संक्रमण, उद्योग चुनौतियां, तकनीक और सप्लाई चेन साझेदारी में माप योग्य प्रगति होनी चाहिए। एफटीए केवल ढांचा देता है, वास्तविक सहयोग कंपनियों के स्तर पर जरूरी है।
इसके तहत ईयू के 97 प्रतिशत निर्यात पर भारत में टैरिफ कम या समाप्त हो गए हैं, जबकि मूल्य के आधार पर 99 प्रतिशत भारतीय निर्यात को प्राथमिकता मिली है। यूरोपीय कारों पर 40 प्रतिशत शुल्क बना रहेगा, वहीं भारत आवश्यक औद्योगिक वस्तुओं पर धीरे-धीरे ड्यूटी हटाने को तैयार है।
यूरोप पर आर्थिक संबंधों को विविध बनाने का दबाव है। एफटीए इस दिशा में अच्छी शुरुआत है, जो रणनीतिक साझेदारी का वर्ष साबित हो सकता है। भारत-ईयू व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) पहले से सेमीकंडक्टर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम कर रही है। यह समझौता विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता तंत्र और संयुक्त अनुसंधान को सक्रिय करेगा।
हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईयू अमेरिका पर तकनीकी निर्भरता कम करना चाहता है। ऐसे में एआई और डेटा साझाकरण पर निकट सहयोग से अमेरिका-चीन के वर्चस्व के विकल्प बन सकते हैं। यह साझेदारी वैश्विक अनिश्चितताओं के खिलाफ मजबूत ढाल बनेगी।