
यूरोप के बौद्धिक इतिहास में स्वतंत्र सोच का प्रतीक बने जियोर्दानो ब्रूनो की कहानी सत्ता की क्रूरता की याद दिलाती है। 1548 में इटली के नोला में जन्मे इस दार्शनिक, गणितज्ञ और खगोलवेत्ता ने पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। डोमिनिकन मठ में शिक्षा के दौरान ही उन्होंने कोपरनिकस के सूर्यकेंद्रित मॉडल से प्रेरणा ली और ब्रह्मांड को अनंत घोषित कर दिया।
उनका मानना था कि ब्रह्मांड में असंख्य तारे हैं, प्रत्येक अपने सौरमंडल का केंद्र हो सकता है। अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावना जताना उस समय के पृथ्वी-केंद्रित दृष्टिकोण के विरुद्ध था। ईश्वर को ब्रह्मांड की असीम ऊर्जा मानते हुए ब्रूनो ने तर्क को सर्वोच्च स्थान दिया। चर्च ने इसे विधर्म माना।
1592 में वेनिस से गिरफ्तार होकर रोम ले जाए गए। आठ वर्षों की कठोर पूछताछ के बावजूद उन्होंने विचार त्यागने से इनकार किया। 17 फरवरी 1600 को कैंपो दे’ फियोरी में उन्हें जिंदा भस्म कर दिया गया। आज उसी स्थान पर उनकी प्रतिमा खड़ी है, जो वैज्ञानिक जिज्ञासा और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का प्रतीक बनी हुई है। ब्रूनो की विरासत हमें सिखाती है कि सत्य की खोज कभी आसान नहीं होती।