
पेरिस, 27 जनवरी। बुसी-सेंट-जॉर्जेस में बीएपीएस के पहले पारंपरिक हिंदू मंदिर के लिए भारत से लाई गई पहली शिलाओं के आगमन ने फ्रांस-भारत सांस्कृतिक संबंधों में नया अध्याय जोड़ा है। यह ऐतिहासिक क्षण मंदिर निर्माण के अगले चरण की शुरुआत करता है, जहां प्राचीन भारतीय शिल्पकला और फ्रांसीसी इंजीनियरिंग का अनूठा मेल होगा।
भारत के कुशल कारीगरों ने इन शिलाओं को हाथों से तराशा है, जो सदियों की वास्तुकला परंपरा को जीवंत करती हैं। फ्रांस में भारतीय कारीगर नोट्रे-डेम कैथेड्रल की मरम्मत करने वाले फ्रांसीसी विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करेंगे। यह केवल पत्थरों का आना नहीं, बल्कि संस्कृतियों का संगम है।
यह मंदिर पूजा स्थल से कहीं अधिक होगा—यह संस्कृति, शिक्षा और समुदाय का केंद्र बनेगा। पूरा होने पर यह两国 के बीच मैत्री का प्रतीक स्थापित करेगा। समारोह में स्थानीय और राष्ट्रीय नेता उपस्थित हुए, जिन्होंने इसकी महत्ता पर जोर दिया।
परियोजना सीईओ संजय करा ने कहा, ‘ये शिलाएं विरासत और भक्ति का प्रतीक हैं। महंत स्वामी महाराज की प्रेरणा से यह भारतीय परंपरा और फ्रांसीसी कौशल का सुंदर मिश्रण बनेगा।’ भारत के राजदूत संजीव कुमार सिंघला ने इसे दो महान परंपराओं का मेल बताया। फ्रांस के राजदूत जीन-क्रिस्टोफ प्यूसेल और उप-प्रांत अधिकारी आलैन न्गौोटो ने इसे两国 मित्रता का आधार स्तंभ कहा।
यह परियोजना वैश्विक सांस्कृतिक एकता का उदाहरण बनेगी, जो आनेवाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी।