
फिदेल कास्त्रो का 19 फरवरी 2008 को सत्ता त्याग एक साधारण घटना नहीं थी, बल्कि क्यूबा के आधे सदी पुराने क्रांतिकारी दौर का अंत थी। 1959 की क्रांति से उभरे इस योद्धा ने अमेरिकी समर्थित तानाशाही को उखाड़ फेंका और समाजवादी व्यवस्था की नींव रखी। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ से गठजोड़ ने क्यूबा को विश्व पटल पर प्रमुखता दी, जबकि 1962 का मिसाइल संकट दुनिया को परमाणु तबाही के मुहाने पर ले आया।
कास्त्रो ने शिक्षा में साक्षरता क्रांति चलाकर अशिक्षा मिटाई और स्वास्थ्य क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रणाली विकसित की, जो आज भी विकासशील देशों के लिए मॉडल है। हालांकि, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर पाबंदी और विरोधियों का दमन उनकी विरासत पर स्याही का धब्बा बन गया।
स्वास्थ्य समस्याओं से 2006 में भाई राउल को सत्ता सौंपी, जो 2008 में स्थायी हुई। राउल ने छोटे कारोबारों को अनुमति दी, विदेशी निवेश आकर्षित किया। 2014 में ओबामा के साथ संबंध सामान्यीकरण आशा जगा गया, लेकिन ट्रंप ने प्रतिबंध सख्त कर दिए।
आज मिगुएल डियाज-कैनेल के नेतृत्व में क्यूबा महंगाई, बिजली-पानी की किल्लत से जूझ रहा है। सीमित सुधारों से स्थिरता लाने की कोशिश हो रही, लेकिन एकदलीय ढांचा कायम। कास्त्रो की यादें क्यूबा को प्रेरित करती हैं, जो प्रतिरोध की मिसाल बना।