
शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने 17 जनवरी 1961 को अपने विदाई संबोधन में एक ऐसी चेतावनी दी, जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने ‘मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ शब्द गढ़कर सेना, हथियार उद्योग और राजनीतिक नेतृत्व के गठजोड़ को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। द्वितीय विश्व युद्ध के हीरो होने के बावजूद, आइजनहावर ने समझा कि स्थायी हथियार उत्पादन कैसे आर्थिक हितों को नीतियों पर हावी कर सकता है।
उनके अनुभव ने उन्हें यह देखने में सक्षम बनाया कि युद्धोत्तर अमेरिका में रक्षा क्षेत्र एक स्थायी उद्योग बन चुका था। कंपनियां अनुबंधों के लिए लॉबिंग करतीं, अनावश्यक संघर्षों को बढ़ावा देतीं। आइजनहावर ने जागरूक नागरिकों, स्वतंत्र मीडिया और संसद से निगरानी की अपील की। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के सैन्यीकरण पर भी आगाह किया।
वियतनाम युद्ध और बाद के हस्तक्षेपों ने उनकी भविष्यवाणी को सत्यापित किया। आज जब रक्षा बजट ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुके हैं और तकनीक युद्ध से जुड़ रही है, आइजनहावर का संदेश एक जीवंत चेतावनी बन गया है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए सतर्कता ही एकमात्र रास्ता है।