
9 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर खून की नदियां बहने लगीं। यह था ब्लडी संडे, जब हजारों मजदूरों, महिलाओं और बच्चों ने शांतिपूर्ण जुलूस निकालकर विंटर पैलेस की ओर कूच किया। उनके हाथों में धार्मिक चिह्न और जार निकोलस द्वितीय के लिए याचिका थी। रूस-जापान युद्ध की हार और मजदूरों की बदतर जिंदगी ने इस आंदोलन को जन्म दिया था।
पादरी जॉर्जी गैपोन के नेतृत्व में चली यह यात्रा जार तक अपनी पीड़ा पहुंचाने वाली थी। लेकिन सेना ने बिना चेतावनी गोलियां चला दीं। सैकड़ों की मौत, हजारों घायल। इस नरसंहार ने जार को जनता का मसीहा मानने का भ्रम तोड़ दिया।
पूरे रूस में हड़तालें, किसान विद्रोह और सैन्य बगावतें फैल गईं। 1905 की क्रांति का बीज यहीं बोया गया, जो 1917 की बड़ी क्रांति की आधारशिला बनी। दबाव में जार को अक्टूबर घोषणापत्र जारी करना पड़ा, जिसमें ड्यूमा संसद का वादा किया गया।
हालांकि सुधार अधरचे रह गए, लेकिन ब्लडी संडे ने साबित कर दिया कि दमन से जनाक्रोश को नहीं दबाया जा सकता। यह घटना आज भी शासकों के लिए चेतावनी है।