
बांग्लादेश में आगामी चुनावों के मद्देनजर जमात-ए-इस्लामी ने अपने घोषणापत्र में महिलाओं को सुरक्षा और प्रतिनिधित्व देने के आकर्षक वादे किए हैं। लेकिन एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पार्टी का पारंपरिक कट्टरपंथी रुख जस का तस बना हुआ है, जो इन दावों को खोखला साबित करता है।
पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान चुनावी सभाओं में महिलाओं की ‘सुरक्षा और सम्मान’ की दुहाई देते हैं। घोषणापत्र में सुरक्षित कामकाजी माहौल, मातृत्व अवकाश, महिलाओं के लिए विशेष बसें, सीसीटीवी और हेल्पलाइन जैसी योजनाएं शामिल हैं। अल्पसंख्यकों समेत महिलाओं को मंत्रिमंडल में जगह देने का भी वचन है।
हकीकत इससे उलट है। जमात ने एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। नेतृत्व के सर्वोच्च पदों पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। शरिया कानून पर अस्पष्टता महिलाओं को अधीनता के दायरे में रखने का संकेत देती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये वादे सशक्तिकरण कम, संरक्षण अधिक पर केंद्रित हैं। महिलाओं को कमजोर वर्ग मानकर उनकी सार्वजनिक भूमिका सीमित रखने की मंशा झलकती है। इस्लामी आंदोलनों में यह विरोधाभास आम है, लेकिन जमात इसका ज्वलंत उदाहरण है।
चुनाव नजदीक आते हुए बांग्लादेशी मतदाताओं को इन प्रतीकात्मक वादों से सावधान रहना होगा। वास्तविक बदलाव के बिना जमात का रुख महिलाओं के लिए समानता नहीं, बल्कि पुरानी सोच का विस्तार ही साबित होगा।