
ढाका के हालिया 13वें संसदीय चुनावों में जमात-ए-इस्लामी ने वोटों के लिहाज से दूसरा स्थान हासिल किया, लेकिन सीटों की संख्या बेहद कम रही। यह विरोधाभास पार्टी के लंबे विवादास्पद इतिहास से जुड़ा है, जो आज भी उसकी राजनीतिक प्रगति को बाधित कर रहा है।
मौलाना मौदूदी द्वारा गठित यह संगठन शुरू से ही कट्टर इस्लामी विचारधारा पर अडिग रहा। विभाजन के बाद पाकिस्तान में स्थानांतरित होकर इसने सशस्त्र तरीकों से अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश की। छात्र संगठन इस्लामी जमीयत-ए-तलाबा ने विश्वविद्यालयों में हिंसा का राज कायम किया—बूथ कब्जा, अपहरण, हत्याएं और धमकियां आम रहीं।
1971 के मुक्ति संग्राम में जमात ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया, बंगाली राष्ट्रवाद का विरोध किया। रजाकारों के रूप में उस पर नरसंहार में सहयोग के आरोप लगे, जिसने बांग्लादेश में इसकी छवि को हमेशा के लिए खराब कर दिया। स्वतंत्रता के बाद कई बार प्रतिबंधित हुई पार्टी को बाद में सशर्त अनुमति मिली।
आज भी इसकी शरिया-प्रधान राजनीति बहुसंख्यक बंगालियों को स्वीकार्य नहीं। आर्थिक मुद्दों पर वोट मिले, लेकिन ऐतिहासिक काले धब्बे ने गठबंधनों को तोड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना वैचारिक सुधार और 1971 के लिए माफी के सत्ता की दहलीज दूर है। वैश्विक नजरें भी इसकी गतिविधियों पर बनी हैं।