
वाशिंगटन। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) की एक रिपोर्ट बांग्लादेश के हालिया चुनाव परिणामों से जेन-जी आंदोलन की सच्चाई उजागर करती है। अगस्त 2024 के विशाल प्रदर्शनों ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटा दिया था, जो एशिया में जेन-जी की पहली बड़ी जीत थी। इसने नेपाल, इंडोनेशिया और अन्य जगहों पर युवा विद्रोह को प्रेरित किया, जिसका असर मेडागास्कर, अफ्रीका और कैरिबियन तक पहुंचा।
फिर भी, विशेषज्ञ जोशुआ कुर्लांट्जिक का कहना है कि जेन-जी के विरोध सड़क पर भले जीतते हों, लेकिन चुनावी मैदान में नाकाम साबित हो रहे हैं। थाईलैंड में युवा समर्थित पार्टी की हार और जापान में एलडीपी की भारी जीत इसका प्रमाण हैं।
बांग्लादेश में भी यही हुआ। हसीना के जाने के बाद बीएनपी ने भारी मतों से जीत हासिल की, जो देश की पुरानी दो-पक्षीय व्यवस्था का हिस्सा है। प्रदर्शनकारियों ने नेशनल सिटिजन पार्टी बनाई, लेकिन 30 में से सिर्फ छह सीटें जीतीं—एक कमजोर प्रदर्शन।
मतदाताओं ने बीएनपी को लोकतंत्र बचाने, अर्थव्यवस्था सुधारने और भ्रष्टाचार रोकने के वादों पर चुना। अब सवाल है कि क्या बीएनपी इन पर अमल करेगी? यदि नहीं, तो देश पुरानी समस्याओं में फंसा रहेगा।
दूसरे नंबर पर जमात-ए-इस्लामी रही, जिसका अतीत हिंसा से सना है। चुनाव पूर्व हिंसा की बाढ़ आई, हालांकि मतदान दिवस स्वतंत्र रहा। जेन-जी को सबक मिला है कि सड़क की जीत वोटों में नहीं बदलती।