
11 फरवरी 1929 को रोम के लेटरन पैलेस में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसने यूरोपीय इतिहास की दिशा बदल दी। इटली के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनितो मुसोलिनी और वेटिकन के कार्डिनल पिएत्रो गैस्पारी के बीच हस्ताक्षरित इस लेटरन संधि ने वेटिकन सिटी को एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र का दर्जा प्रदान किया। यह संधि लगभग 59 वर्ष पुराने ‘रोमन प्रश्न’ विवाद का अंत थी, जो 1870 में इटली के एकीकरण के बाद शुरू हुआ था।
इटली ने रोम पर कब्जा कर लिया था, जिससे पोप की सांसारिक शक्तियां छिन गईं। लगातार पोपों ने इसका विरोध किया। मुसोलिनी ने अपनी फासीवादी सरकार को मजबूत करने के लिए चर्च से सुलह का रास्ता चुना। पोप पायस ग्यारहवें ने इसे चर्च की आध्यात्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक माना।
संधि के प्रमुख बिंदु थे- वेटिकन सिटी की स्वतंत्रता, रोम को इटली की राजधानी के रूप में मान्यता, कैथोलिक धर्म को इटली का राज्य धर्म घोषित करना और चर्च को भारी आर्थिक मुआवजा। इसने दोनों पक्षों के संबंधों को नया आयाम दिया।
इतिहासकार पोप पायस की दूरदर्शिता की सराहना करते हैं। उन्होंने राजनीतिक हकीकत को स्वीकार कर चर्च के वैश्विक मिशन को प्राथमिकता दी। आज 97 वर्ष बाद भी यह संधि धर्म और राज्य के बीच संतुलन का उदाहरण बनी हुई है। वेटिकन सिटी दुनिया का सबसे छोटा देश है, जो आध्यात्मिक नेतृत्व का केंद्र बना हुआ है।