
ड्यूरंड रेखा के पार भड़की हिंसा ने 48 घंटों में 31 पख्तूनों की जान ले ली है। पाकिस्तान के हवाई हमलों से शुरू हुई यह घटनाचक्र अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत के बिसूद इलाके में रिहायशी बस्ती पर गिरे बमों से भड़का। इस्लामाबाद ने दावा किया कि टीटीपी के अड्डे निशाने थे, लेकिन स्थानीय अफगान अधिकारी और स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार 17 निर्दोष नागरिक मारे गए, जिनमें 11 बच्चे और कई महिलाएं शामिल हैं।
रक्षा सूत्रों की मानें तो घटनास्थल पर कोई आतंकी कैंप नहीं दिखा, बल्कि ढह चुके घरों और कफन ओढ़े बच्चों के शवों की तस्वीरें हैं। अगले ही दिन पाकिस्तान के खैबर जिले की तिराह घाटी में मोर्टार गोले एक सिविलियन वाहन पर गिरे, जिसमें पांच पख्तून मारे गए, दो बच्चे थे। नाराज ग्रामीणों ने सैन्य चौकी पर प्रदर्शन किया, तो सुरक्षाबलों ने गोलियां चला दीं—चार की मौत, पांच घायल।
कुल 26 पाकिस्तान में और पांच अफगानिस्तान में हताहत। जनवरी 2025 से पाक आतंकरोधी कार्रवाइयों में 168 से ज्यादा पख्तून मारे जा चुके। सितंबर 2025 से फरवरी 2026 तक अफगानिस्तान में पाक हमलों से 88 नागरिकों की मौत। पैटर्न साफ—पख्तून इलाकों में साधारण लोग, रिहायशी इलाके निशाना, आतंकरोधी नाम।
टीटीपी की पख्तून जड़ें होने से पाकिस्तान स्थानीय समर्थन का हवाला देता है, लेकिन आलोचक इसे सामूहिक सजा बताते हैं। गांवों को ऑपरेशनल जोन घोषित, घर तोड़े, ड्रोन हमले, विरोधियों पर गोलियां। 1947 के बाद पंजाबी वर्चस्व वाली सेना पर पख्तून शिकायतें—भारी तैनाती, कर्फ्यू, गायब करने, बमबारी। यह संरचनात्मक दमन का रूप ले चुका है। पख्तून क्षेत्र संदिग्ध नजर आने लगे हैं।