
नई दिल्ली, 13 फरवरी। पुराने लकड़ी के रेडियो सेट याद हैं? डायल घुमाते ही लंदन की खबरें या सीलोन के गीत गूंज उठते थे। 1912 में टाइटैनिक हादसे में रेडियो ने एसओएस सिग्नल भेजकर सैकड़ों जिंदगियां बचाईं। आज विश्व रेडियो दिवस पर हम इस माध्यम की अमर कहानी को सलाम करते हैं।
2010 में स्पेन के जॉर्ज अल्वारेज के प्रस्ताव पर शुरू हुई यह परंपरा 2011 में यूनेस्को की मंजूरी से वैश्विक बनी। उसी दिन 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की शुरुआत हुई थी। यह दिन रेडियो की लोकतांत्रिक शक्ति का उत्सव है।
भारत में आकाशवाणी ही रेडियो का पर्याय है। रवींद्रनाथ टैगोर के नाम से 1936 में शुरू हुई एआईआर ने स्वतंत्रता संग्राम से डिजिटल इंडिया तक का साक्षी बनाया। देवकी नंदन पांडे की ‘आकाशवाणी से समाचार’ और अमीन सयानी के ‘बहनो भाइयो’ ने इसे घर-घर का साथी बनाया।
पीएम मोदी का ‘मन की बात’ रेडियो को फिर जीवंत कर रहा है। प्रसार भारती का 2026 का ‘वेव्स’ ऐप 65+ चैनल और रेडियो स्ट्रीम लाएगा।
आपदा में इंटरनेट बंद हो या बिजली जाए, रेडियो लाइफलाइन है। सामुदायिक रेडियो स्थानीय भाषाओं में चेतावनियां देकर जानें बचाते हैं। एनालॉग से एआई तक, रेडियो ने हर बदलाव अपनाया, लेकिन इंसानी भावना अब भी इसका दिल है। विश्व रेडियो दिवस मुबारक!