
रात के गहन अंधेरे में जब सूरज ढल चुका होता है, तब भी कुछ बादल अपनी चमक बिखेरते हैं। इन्हें नॉक्टिलुसेंट क्लाउड्स कहा जाता है, जो पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी सतह मेसोस्फीयर में 50 से 86 किलोमीटर की ऊंचाई पर बनते हैं। ये बर्फ के सूक्ष्म क्रिस्टलों से निर्मित होते हैं, जो सूर्य की किरणों को परावर्तित कर रोशनी फैलाते हैं।
ये बादल गर्मियों में ध्रुवीय क्षेत्रों के निकट अधिक दिखाई देते हैं। दिन में ये अदृश्य रहते हैं, लेकिन सांझ ढलते ही नीला-चांदीया रंग लिए चमकने लगते हैं। नासा की एआईएम मिशन ने 2007 में इनका विस्तृत अध्ययन आरंभ किया, जिसने उत्तरी गोलार्ध में इनके पूर्ण चित्रण को पहली बार कैद किया।
अवलोकनों से पता चला कि ये बादल प्रतिदिन प्रकट होते हैं, विशाल क्षेत्रों में फैलते हैं और घंटों से लेकर दिनों तक रूप बदलते रहते हैं। इनकी चमक 82 से 89 किलोमीटर ऊपर एक सतत बर्फ परत पर निर्भर करती है। पिछले दो दशकों में ये अधिक तेजस्वी हो गए हैं और निम्न अक्षांशों तक पहुंच गए हैं।
बढ़ते मीथेन उत्सर्जन से मेसोस्फीयर में जलवाष्प की मात्रा बढ़ रही है, जो इन बादलों को मजबूत बना रही है। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का संकेत मानते हैं। ये रहस्यमयी बादल न केवल आकाश की सुंदरता बढ़ाते हैं, बल्कि पर्यावरणीय चेतावनी भी देते हैं।