
राज्यसभा में गुरुवार को आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) योजनाओं पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश में एआई के विकास में पैसा, निवेश या कुशलता की कमी नहीं, बल्कि ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) जैसे कंप्यूटेशनल संसाधनों का अभाव सबसे बड़ी समस्या है।
चड्ढा ने सदन को अवगत कराया कि वैश्विक सप्लाई चेन की परेशानियों और जीपीयू की बढ़ती कीमतों से डेटा सेंटर्स का विस्तार रुक गया है और उन्नत एआई मॉडल्स का प्रशिक्षण असंभव हो चला है। भारत के पास अभी मात्र 34,000 जीपीयू उपलब्ध हैं, जो विश्वस्तरीय एआई सिस्टम बनाने के लिए नाकाफी हैं।
अध्यक्ष के माध्यम से उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय से पूछा कि इन संसाधनों की सुरक्षित पहुंच के लिए सरकार के क्या लक्ष्य, समयबद्ध योजनाएं और वैश्विक प्रयास हैं।
जवाब में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने स्वीकार किया कि जीपीयू की कमी वैश्विक चुनौती है और एआई का आधारभूत तत्व इन्हीं पर टिका है। इंडिया एआई मिशन में ‘कंप्यूट’ को प्रमुख स्तंभ बनाया गया है, जिसके तहत चयनित प्रदाताओं से उच्च क्षमता वाली सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिसमें पात्रों को 40 फीसदी तक छूट मिलती है।
30 अरब या 65 अरब पैरामीटर्स वाले बड़े मॉडल्स के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाए जा रहे हैं। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए कल ही प्रस्तावों की पहली कॉल जारी की गई। सिंह ने भरोसा जताया कि ये कदम भारत को वैश्विक एआई नेतृत्व दिलाएंगे।
भारत के एआई भविष्य के लिए जीपीयू संकट का समाधान जरूरी है, ताकि स्वास्थ्य, कृषि जैसे क्षेत्रों में क्रांति हो सके।