
हरियाणा के बहादुरगढ़ में 3 मार्च 1997 को जन्मे योगेश कथुनिया के माता-पिता उन्हें डॉक्टर बनते देखना चाहते थे। लेकिन नौ साल की उम्र में गिलेन-बैरे सिंड्रोम ने उनके पैरों को लकवा मार दिया। न्यूरोलॉजिकल इस बीमारी ने मांसपेशियों को कमजोर कर दिया, लेकिन मां मीना देवी की मेहनत और फिजियोथेरेपी से वे बैसाखी पर खड़े हो सके।
खेलों में रुचि रखने वाले योगेश को 2016 में किरोड़ीमल कॉलेज के सचिन यादव ने पैरा एथलीट्स के वीडियो दिखाकर प्रेरित किया। बर्लिन 2018 में एफ36 कैटेगरी में 45.18 मीटर का विश्व रिकॉर्ड थ्रो किया। टोक्यो पैरालंपिक 2020 में एफ56 डिस्कस में रजत पदक दिलाया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अर्जुन अवॉर्ड दिया।
2022 में सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी ने छह माह रोका, लेकिन पेरिस 2024 और 2025 विश्व चैंपियनशिप में फिर रजत। योगेश की कहानी प्रेरणा है कि विकलांगता लक्ष्य को नहीं रोक सकती।