
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में विनोद कांबली का नाम उन खिलाड़ियों की फेहरिस्त में शुमार है, जिनकी प्रतिभा ने सबको आश्चर्यचकित किया लेकिन जिन्होंने उसे परिपक्वता से नहीं संभाला। 18 जनवरी 1972 को मुंबई में जन्मे कांबली ने बचपन में ही सचिन तेंदुलकर के साथ मिलकर स्कूल क्रिकेट में इतिहास रच दिया था। जहां सचिन ने 1989 में अंतरराष्ट्रीय पटल पर कदम रखा, वहीं कांबली का टेस्ट सफर 29 जनवरी 1993 को कोलकाता के इडन गार्डन्स में इंग्लैंड के खिलाफ शुरू हुआ।
मोहम्मद अजहरुद्दीन की अगुवाई में भारत ने टॉस जीतकर गेंदबाजी चुनी। इंग्लैंड पहली पारी में 163 पर ढेर हो गया। अजहर के 182 रनों की बदौलत भारत ने 371 रन ठोके। तीसरे नंबर पर उतरे कांबली सिर्फ 16 रन बना सके। 208 रनों की बढ़त मिली तो इंग्लैंड को फॉलोऑन खेलना पड़ा। उनकी दूसरी पारी 286 पर सिमटी। भारत ने 79 रनों का लक्ष्य 2 विकेट खोकर हासिल कर 8 विकेट से जीत दर्ज की। कांबली दूसरी पारी में 18* पर नाबाद रहे।
इसके बाद कांबली ने 17 टेस्ट में 1084 रन बनाए, जिसमें 4 शतक और 3 अर्धशतक शामिल थे। औसत 54.20 और सर्वोच्च 227। लेकिन फॉर्म लंबे समय तक नहीं टिकी। वनडे में 104 मैचों में 2477 रन (2 शतक, 14 अर्धशतक) बनाए। आखिरी वनडे 2000 में खेला।
कभी सचिन से बेहतर तकनीक वाले कांबली का करियर अनुशासनहीनता से पटरी से उतर गया। हाल में बीमारी और आर्थिक संकट ने सुर्खियां बटोरीं। एक साक्षात्कार में उन्होंने फिटनेस और बेटे को ट्रेनिंग देने का संकल्प लिया। वे स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।