
भारतीय फुटबॉल के इतिहास में जरनैल सिंह ढिल्लों का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। 20 फरवरी 1936 को फैसलाबाद में जन्मे जरनैल ने विभाजन की त्रासदी झेली। 1948 में मात्र 12 वर्ष की आयु में परिवार के कई सदस्यों की हत्या के बाद वे करीब 50 लोगों से भरे ट्रक में अमृतसर पहुंचे। भारत आकर फुटबॉल ने उन्हें नई जिंदगी दी।
खालसा कॉलेज महिलपुर (1952-56) से शुरुआत के बाद 1956 में होशियारपुर के खालसा स्पोर्टिंग क्लब में सीनियर करियर शुरू हुआ। 1959 से 1968 तक मोहन बागान के साथ खेलते हुए युगांडा, केन्या जैसे देशों में कमाल दिखाया। सेंटर-बैक के रूप में एशिया के शीर्ष रक्षक माने गए।
1965-67 तक राष्ट्रीय टीम के कप्तान रहे। 1960 ओलंपिक, 1962 जकार्ता एशियाई खेलों में स्वर्ण, 1964 मर्डेका कप में उपविजेता। संतोष ट्रॉफी बंगाल से चार बार और पंजाब से 1970-71 में जीती। कोचिंग में 1974-75 पंजाब विजेता। 1964 में अर्जुन सम्मान।
पंजाब खेल विभाग में 1985-94 तक महत्वपूर्ण भूमिका। बेटे जगमोहन भी भारतीय डिफेंडर थे, 1993 सार्क कप में खेले। जगमोहन की असमय मृत्यु के बाद कनाडा चले गए, जहां 13 अक्टूबर 2000 को वैंकूवर में 64 वर्ष की आयु में अस्थमा से निधन।
शरणार्थी से फुटबॉल आइकन तक का सफर प्रेरणा का स्रोत है।