
जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग में आयोजित छठे खेलो इंडिया विंटर खेलों ने भारत के शीतकालीन खेलों में नई ऊंचाइयों को छुआ। खिलाड़ियों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया, लेकिन सभी का मानना है कि उनकी जीत का मूल आधार हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (एचएडब्ल्यूएस) की कठोर ट्रेनिंग है।
देश भर के राज्यों, सेना, सीआरपीएफ और आईटीबीपी के एथलीटों ने एचएडब्ल्यूएस को अपनी सफलता का प्रमुख श्रेय दिया। दिसंबर 1948 में ब्रिगेडियर जनरल के.एस. थिमैया द्वारा स्थापित यह संस्था शुरू में 19वीं इन्फैंट्री डिवीजन स्की स्कूल के रूप में जानी गई। बाद में यह विंटर वारफेयर का केंद्र बनी और 1962 में ए कैटेगरी का दर्जा प्राप्त किया।
ऊंचाई वाले युद्ध और बर्फीले इलाकों में जीवित रहने की ट्रेनिंग के लिए विख्यात एचएडब्ल्यूएस अब खिलाड़ियों का भी पाठ्यक्रम संचालित करता है। शिलांग की 25 वर्षीय काजल कुमारी राय ने 2024 से पूर्व बर्फ नहीं देखी थी। मात्र 15 दिनों के एचएडब्ल्यूएस प्रशिक्षण के बाद वह नॉर्डिक 15 किमी और 10 किमी स्प्रिंट चैंपियन बन गईं। उन्होंने कहा, ‘सीआरपीएफ ने दिशा दी, एचएडब्ल्यूएस ने आत्मविश्वास जगाया।’
कर्नाटक की 23 वर्षीय भवानी टी.एन. ने भी बिना बर्फ के अनुभव के नॉर्डिक महिला 1.5 किमी स्प्रिंट में स्वर्ण और 15 व 10 किमी में कांस्य जीते। एचएडब्ल्यूएस और आईआईएसएम ने उनके कौशल को निखारा।
पुरुष नॉर्डिक 10 किमी में सेना ने स्वर्ण (पद्मा नमगेल), रजत (अमन) और कांस्य (मंजीत) हासिल किए। 1.5 किमी स्प्रिंट में सनी सिंह, शुभम परिहार व मंजीत ने सेना का जलवा बिखेरा। नमगेल बोले, ‘एचएडब्ल्यूएस सभी बलों व राज्यों के एथलीट तैयार करता है। फंडिंग-कोचिंग की कमी नहीं, श्रेष्ठ खिलाड़ियों को यूरोप भेजा जाता है।’
प्रति वर्ष 250-300 सैन्य एथलीट व 5-10 नागरिक यहां प्रशिक्षित होते हैं। अल्पाइन स्की सिमुलेटर, रोलर स्की, जिम व इंडोर कॉम्प्लेक्स जैसी सुविधाएं विश्वस्तरीय हैं। सीआरपीएफ एथलीट भी एचएडब्ल्यूएस से मजबूत हो रहे हैं। गुलमर्ग के पदक एथलीटों के हैं, लेकिन चैंपियन बनाने का श्रेय एचएडब्ल्यूएस को।