
भारतीय घुड़सवारी को 1982 में रघुबीर सिंह के स्वर्ण पदक के बाद लंबे समय तक पदक का इंतजार करना पड़ा। लेकिन बेंगलुरु के फवाद मिर्जा ने जकार्ता एशियाई खेलों में व्यक्तिगत और टीम दोनों वर्गों में रजत पदक जीतकर इस सूखे को समाप्त कर दिया। परिवार की परंपरा से जुड़े इस खिलाड़ी ने कड़ी मेहनत से खेल को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
6 मार्च 1992 को कर्नाटक में जन्मे फवाद के पिता डॉ. हसनिन घोड़ों के चिकित्सक थे। बचपन से घोड़ों के बीच पलने वाले फवाद ने न्यूजीलैंड के मार्क टॉड को अपना गुरु माना। जर्मनी में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने इवेंटिंग में महारत हासिल की, जिसमें ड्रेसेज, क्रॉस कंट्री और जंपिंग शामिल है।
2018 के एशियाई खेलों में फवाद का जलवा देखने लायक था। जंपिंग में 26.40 स्कोर के साथ व्यक्तिगत रजत और राकेश कुमार, आशीष मलिक व जितेंद्र सिंह के साथ 121.30 अंकों से टीम रजत। 1982 के बाद पहली बार भारत को यह सफलता मिली।
इसके बाद टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए क्वालीफाई कर फवाद ने इतिहास रचा। वे 20 वर्षों में पहले भारतीय घुड़सवार बने। ओलंपिक में पदक न सही, लेकिन उनके प्रदर्शन ने खेल को पुनर्जीवित किया। 2019 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित फवाद युवाओं के लिए प्रेरणा हैं।
फवाद की कहानी साबित करती है कि विरासत और लगन से कोई सपना असंभव नहीं। भारतीय घुड़सवारी अब नई दिशा में अग्रसर है।