
बिहार का मुजफ्फरपुर जिला अब शरद कुमार के नाम से चमक रहा है। 1 मार्च 1992 को जन्मे इस बिहारी सपूत को मात्र दो साल की उम्र में एक फर्जी पोलियो दवा ने बाएं पैर में लकवा मार दिया। लेकिन परिवार के सहयोग से उन्होंने हार नहीं मानी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एमए करने वाले शरद पैरा हाई जंपर के रूप में विश्व पटल पर छाए हुए हैं।
2010 में ग्वांगझू एशियाई पैरा खेलों से अंतरराष्ट्रीय सफर शुरू किया। रियो 2016 पैरालंपिक में छठा स्थान, 2017 विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत, टोक्यो 2020 में कांस्य और पेरिस 2024 में रजत पदक उनकी झोली में हैं। पूर्व विश्व नंबर एक शरद ने इंचियोन 2014 और जकार्ता 2018 पैरा एशियाई खेलों में स्वर्ण जीता। जकार्ता में 1.90 मीटर की उछाल ने खेल रिकॉर्ड और महाद्वीपीय रिकॉर्ड गढ़ा।
शरद की सफलता बिहार के खेल तंत्र की कमियों को उजागर करती है। प्रतिभाओं की भरमार है, लेकिन सुविधाओं का अभाव। उनका संघर्ष लाखों युवाओं को प्रेरित कर रहा है। देश को ऐसे और हीरो चाहिए, जो बाधाओं को पार कर नाम रौशन करें। शरद ने साबित कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी असंभव नहीं।