
क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में विनोद कांबली का नाम आज भी एक अनकही कहानी की तरह बसा है। सचिन तेंदुलकर के साथ स्कूल क्रिकेट में 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी करने वाले इस बाएं हाथ के बल्लेबाज ने अपने खेल से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय पटल पर उनका सफर अधूरा रह गया, जो निराशा का प्रतीक बन गया।
1990 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू करने वाले कांबली ने जल्द ही अपनी छाप छोड़ी। 1993 के दक्षिण अफ्रीका दौरे पर शानदार शतक ने उन्हें स्टार बना दिया। वनडे में भी उनका प्रदर्शन लाजवाब था – वेस्टइंडीज के खिलाफ विस्फोटक पारी हो या इंग्लैंड के विरुद्ध चेज। लेकिन चोटें, फॉर्म में गिरावट और विवादों ने उनका क-career पटरी से उतार दिया।
1996 वर्ल्ड कप का क्वार्टरफाइनल आज भी याद है, जब रोते हुए मैदान छोड़ना पड़ा। उसके बाद चयनकर्ताओं का भरोसा डगमगा गया। घरेलू क्रिकेट में संघर्ष जारी रहा। आज 52 वर्षीय कांबली स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। चलने में दिक्कत, लिवर की बीमारी – वायरल वीडियो ने फैंस को रुला दिया।
सचिन, गांगुली जैसे दिग्गजों ने समर्थन दिया। विशेषज्ञ मानते हैं कि 90 के दशक में मेंटल हेल्थ सपोर्ट की कमी ने नुकसान पहुंचाया। कांबली की कहानी सिखाती है – प्रतिभा के साथ अनुशासन जरूरी है। उनका सफर क्रिकेट को सबक देता रहेगा।