
आज के दौर में बच्चे मानसिक स्वास्थ्य के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। मोबाइल फोन की लत, पढ़ाई का अत्यधिक दबाव और घर का नकारात्मक माहौल तीनों मिलकर युवा दिमागों को खोखला कर रहे हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि चिंता, अवसाद और आत्महत्या के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। एक सर्वे में 10-16 साल के 65 फीसदी बच्चों ने रोजाना तनाव महसूस करने की बात कही। सोशल मीडिया पर साइबरबुलिंग और नींद की कमी मुख्य वजहें हैं।
डॉ. प्रिया शर्मा जैसे विशेषज्ञ बताते हैं, ‘स्मार्टफोन बच्चों का फोकस चुरा लेते हैं।’ अभिभावक टॉप रैंक के लिए बच्चों को घंटों पढ़ने को मजबूर करते हैं, जिससे बचपन कहीं खो जाता है।
घर में कलह, आर्थिक तंगी या भावनात्मक दूरी स्थिति को और बिगाड़ देती है। ऐसे माहौल में बच्चों को मानसिक विकार होने का खतरा दोगुना हो जाता है।
हालांकि समाधान संभव हैं। स्कूलों में माइंडफुलनेस कक्षाएं, स्क्रीन टाइम सीमित करना और काउंसलिंग हेल्पलाइन शुरू हो रही हैं। अभिभावकों को संतुलित रवैया अपनाना होगा ताकि बच्चे स्वस्थ रहें।